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गोधरा के हत्यारे

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  गोधरा के हत्यारे राना अय्यूब की पुस्तक ' गुजरात फ़ाइल्स ' प्रकाशित होने के बाद काफी चर्चा में रही थी | इसके पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ लिखा गया , पुस्तक पर तमाम घटनाओं के तथ्य न देने के आरोप भी लगे | लेकिन इन सब आरोपों प्रत्यारोपों के बावजूद इस पुस्तक की महत्ता बरकरार है और तब तक बरकरार रहेगी जब तक गुजरात या उसके जैसे मॉडल की चर्चा होगी , जहां दंगे , मुठभेड़ , फर्जी एनकाउंटर सामन्य सी लगने वाली चीज हों , जहां राजनेता चरित्रहीन और लाशों के ढेर पर खड़ा हों | पुस्तक में राना अय्यूब ने अपने स्टिंग आपरेशन के जरिए यह बात प्रस्तुत की है कि कैसे गोधरा में हुए ट्रेन आगजनी के बाद मुसलमानों को एक विलेन के रूप में प्रस्तुत किया गया और हिंदुओं को कत्लेआम मचाने की छूट दी गयी , इस नरसंहार में रईसजादों से लेकर मध्यवर्गीय जीवन के लोग चढबढ़ के शामिल थे और दंगा फैलाने के लिए सत्ता का समर्थन हासिल था | जिसके चलते ही नरेन्द्र मोदी ने अपनी हिंदू ध्वज रक्षक की एक वैश्विक छवि गढ़ी | इन्हीं हत्याओं और नरसंहारों के दम पर यह आदमी पूरी दुनिया में चर्चा के केन्द्र में बना रहा | इस पुस्तक का फलक गोधर...

चीन के समाज और संस्कृति का आख्यान

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चीन के समाज और संस्कृति का आख्यान वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहे चीन पर दुनिया भर की नजर है , दुनिया भर के बाजारों में उसके सामान छाए हुए हैं और तीसरी दुनिया के देश तो उससे भरे पड़े हैं। सस्ते दामों में सामानों को उपलब्ध कराने का चीनी विकल्प शायद ही अभी किसी और देश के पास उलब्ध हो ,   ऐसे में चीन को लेकर लोगों में बहुत अधिक जिज्ञासाएँ है , लोग उनकी धरोहरों , विकास और परंपरागत मूल्यों , रोजगार , शिक्षा , पर्यटन , परिवहन सुविधाओं , स्त्रियों की स्थिति आदि को जानने के लिए बेहद उत्सुक रहते हैं। इन विषयों को केंद्र में रखकर हिंदी के वरिष्ठ आलोचक अनिल राय ने कई महत्वपूर्ण संस्मरण लिखे हैं। जिनका संकलन ‘ माओ के देश में ’ नाम से प्रकाशित हुआ है। ‘ माओ के देश में ’ लेखक के ढ़ाई वर्षो के पीकिंग विश्वविद्यालय के प्रवास के दिनों की कहानी है। जिसमें उन्होंने चीन के अलग बिंदुओं पर विचार किया है। ढ़ा ई वर्ष किसी भी देश की संस्कृति, परंपरा और उस पूरे समाज को समझने के लिए तो बहुत कम है, फिर भी लेखक ने उस समाज की संस्कृति, परंपरा और प्रसिद्ध स्थलों के ऐतिहासिक महत्व के साथ साथ भारत की स्थितियों से त...

What is the pratipadya of raidas ke pad.

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                                                                    pratipadya of raidas ke pad      मध्यकाल में वर्ण और जाति व्यवस्था अपने चरम पर थी। ईश्वर को ब्राह्मणों व काजियों ने अपना संगी बना लिया था। मुल्ला मौलवियों का कारोबार बढ चला था तथा समाज में विशेष वर्ण के लोगो का आतंक था। ऐसे समय में दलितों ने अपने संत पैदा किए। इन संतों ने हिंदू मुस्लिम धर्मों को आत्मसात कर उनमें फैली बुराइयों का कड़ा विरोध दर्ज किया। चौथीरम यादव ने लिखा है कि , ‘ आक्सिमक नहीं है कि पूरे देश में रूढ़िवादी ब्राह्मणों द्वारा इन परिवर्तनकामी संतों-महत्माओं का उत्पीड़न किया गया जो जात-पांत ,  ऊंच-नीच और घृणा की सीमा तक फैली छुआछूत के भेदभाव पर आधारित वर्णव्यवस्था को चुनौती दे रहे थे। अयोध्या में पल्टू दास को जिंदा जला दिया गया और महाराष्ट्र में एक ब्राह्मण पुरोहित ने तुकाराम की हत्या कर दी। दोनो समुदाय के कट्टरपंथि...

भीष्म साहनी की कहानियों का सामाजिक यथार्थ

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                              भीष्म साहनी की कहानियों का सामाजिक यथार्थ शुभम यादव              भीष्म साहनी स्वातंत्र्योत्तर    हिन्दी कथा साहित्य के सामर्थ हस्ताक्षर है ,  उनका लेखन सामाजिक यथार्थ से गहरे जुड़ा है। आजादी के पूर्व प्रेमचन्द के कहानियों में सामाजिक यथार्थता दिखाई देती है। इसी परम्परा को यशपाल ,  मोहनराकेश ,  कमलेश्वर ,  भीष्म साहनी आदि ने आगे बढ़ाने का कार्य किया। भीष्म जी ने अपनी कहानियों में मध्यवर्गीय व्यक्ति के बनावटीपन ,  स्वार्थपरता ,  छलना ,  दिखावापन आदि को बड़ी ही सूक्ष्मता से उद्घाटित किया है।            ‘ चीफ की दावत’ कहानी की शुरूआत’ आज की मि 0  शामनाथ के घर चीफ की दावत थी’ से होती है। शामनाथ के घर चीफ की दावत तैयारियां जोर-शोर से हो रही थी। लेकिन इसी बीच में एक शब्द आता है माँ ,    माँ मानवीय सम्बन्धों की जड़ है लेकिन शामनाथ इस...

प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख

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                                                                                                  प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख शुभम यादव शोधार्थी   हिन्दी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली   इतिहास लेखन की सवर्ण दृष्टि ने फातिमा शेख को इतिहास के गर्भ में विलुप्त कर दिया था किन्तु सबाल्टर्न इतिहासकारों ने इस सवर्ण लेखन की परंपरा के बरक्स अपने अतीत की खोज करनी शुरू की और फातिमा शेख का नाम एक बहुजन आइकन के रूप में दर्ज किया। इनका जन्म उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ था ,  यह सावित्री बाई फूले की सहयोगी थीं। जब फूले दम्पति ने ब्राह्मणवाद की विचारधारा को प्रश्नांकित करते हुए उस पर तमाम सवाल उठाए ,  ईश्वर पर प्रश्न चिन्ह लगाया ,  तत्कालीन समाज में प्रचलित ब्राह्मणों की सत्ता को चैलेंज किया ,  महिलाओं ,...

‘श्रृंखला की कड़ियाँ’: स्त्री-मुक्ति का दस्तावेज

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  ‘ श्रृंखला की कड़ियाँ ’:  स्त्री-मुक्ति का दस्तावेज                                                                                                                                                                                                                                 शुभम यादव                                        ...

'रैदास': जाति-वर्ण और संप्रदाय के बरक्स

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  ‘ रैदास’: जाति-वर्ण और संप्रदाय के बरक्स        भक्ति आंदोलन की उत्पत्ति कोई एकाएक नही हुयी थी बल्कि वह एक लम्बी प्रक्रिया का परिणाम था। इसकी जमीन अश्वघोष ,  नागार्जुन ,  सरहपा आदि लोग तैयार कर रहे थे। यह एक विराट जन आंदोलन था ,  जो जातीय भेदभाव ,  वर्चस्वाद और कठमुल्लापन के विरुद्ध समता समानता के विचारों पर आधारित था ।  ‘ गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति के बाद मध्यकालीन इतिहास की यह दूसरी बड़ी क्रांति थी। बुद्ध के नवजागरण के बाद यह ऐसा लोकजागरण था जिसके चलते पहली बार हिंदू मुस्लिम समुदाय की निम्नवर्गीय जातियों के बीच से उनके ,  अपने साधु संत और महात्मा पैदा हुए ,  लोकज्ञानी विद्वान और रचनाकार पैदा हुए जिन्होने अखिल भारतीय स्तर पर अपने साहसिक प्रतिरोध से रक्त गोत्र की शुद्धता के मिथ्या दंभ पर आधारित वर्चस्ववादी विचार परंपरा के स्थापित मूल्यों को छिन्न भिन्न कर दिया। ’( लोक और वेद आमने सामने-चौथीराम यादव) मुक्तिबोध ने भक्ति आंदोलन की व्यापकता पर लिखा है कि  ‘ उच्चवर्गीय और निम्नवर्गीय का संघर्ष बहुत पुराना है। यह संघर्...