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Showing posts from January, 2021

'रैदास': जाति-वर्ण और संप्रदाय के बरक्स

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  ‘ रैदास’: जाति-वर्ण और संप्रदाय के बरक्स        भक्ति आंदोलन की उत्पत्ति कोई एकाएक नही हुयी थी बल्कि वह एक लम्बी प्रक्रिया का परिणाम था। इसकी जमीन अश्वघोष ,  नागार्जुन ,  सरहपा आदि लोग तैयार कर रहे थे। यह एक विराट जन आंदोलन था ,  जो जातीय भेदभाव ,  वर्चस्वाद और कठमुल्लापन के विरुद्ध समता समानता के विचारों पर आधारित था ।  ‘ गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति के बाद मध्यकालीन इतिहास की यह दूसरी बड़ी क्रांति थी। बुद्ध के नवजागरण के बाद यह ऐसा लोकजागरण था जिसके चलते पहली बार हिंदू मुस्लिम समुदाय की निम्नवर्गीय जातियों के बीच से उनके ,  अपने साधु संत और महात्मा पैदा हुए ,  लोकज्ञानी विद्वान और रचनाकार पैदा हुए जिन्होने अखिल भारतीय स्तर पर अपने साहसिक प्रतिरोध से रक्त गोत्र की शुद्धता के मिथ्या दंभ पर आधारित वर्चस्ववादी विचार परंपरा के स्थापित मूल्यों को छिन्न भिन्न कर दिया। ’( लोक और वेद आमने सामने-चौथीराम यादव) मुक्तिबोध ने भक्ति आंदोलन की व्यापकता पर लिखा है कि  ‘ उच्चवर्गीय और निम्नवर्गीय का संघर्ष बहुत पुराना है। यह संघर्...

सामाजिक यातनाओं से मुक्ति की तरफ इशारा

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  सामाजिक यातनाओं से मुक्ति की तरफ इशारा                                                                                                                                                                                              कथाकार श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की प्रिय कहानियों का संग्रह ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ नाम से आ गया है ,  इसमें कुल नौं कहानियां संकलित हैं। जो अलग-अलग पृष्ठभूमि को अपने में समाहित किए हुए हैं। यह कहानियां लेखक को प्रिय क्यों है ,  उसका कारण भी बहुत स्पष्ट लेखक...

राजेंद्र यादव: आदमी की निगाह में औरत

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                  राजेंद्र यादव: आदमी की निगाह में औरत                                                           शुभम यादव                                                                 दुनिया के अधिकांश तथाकथित सभ्य समाजों में स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। जबकि मानव के विकास व सभ्यता के निर्माण में उसकी भागीदारी...

मतदाता, गणतंत्र दिवस और संघ के प्रयोग

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  मतदाता , गणतंत्र दिवस और संघ के प्रयोग शुभम यादव          मतदाता और गणतंत्र दिवस के दिन स्कूलों में अब राम सीता और हनुमान के नाम की रैलियाँ कोई आश्चर्य की बात नही बल्कि संघ इससे यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि आज हम आप जहाँ है वो राम और हनुमान के संघर्षों की देन है | समयानुसार वह बुद्ध , कबीर , फूले , लोहिया , अम्बेडकर का भी अपने लिये प्रयोग करता है यह संघ का अपने ढाँचे में किया गया बदलाव है | जिसका परिणाम हम आज देख रहें है | वह लगातार अपने आप में परिवर्तन कर रहा है उसने जनता को बरगलाने के लिये उन तमाम प्रतीकों को हथिया लिया है जिस पर बहुजन तबका गर्व करता रहा है | जिसे वह अब अपने तरीके से इस्तेमाल भी कर रहा हैं | सांस्कृतिक बदलाव के लिये उसने हर जिले में शाखायें खोल रखी है | जिसके माध्यम से वह  समय समय पर झाकीया , रैलियाँ व तमाम फिजूल के कार्यक्रम करता रहता है | आज से तीन चार दशक पहले उसने हर जिले में सरस्वती शिशु मन्दिर की स्थापना की | जिसके माध्यम से वह अपने समाज की आने वाली नयी पीढी से संवाद स्थापित कर रहा है और उनके माध्यम से उनके...